Thursday, July 16, 2009
मैं पिछले तीन महीनो से एमपी छोड़ चुका हु। ऐसे कई बातें है जो मुझे एमपी की याद आती है लकिन ऐसे भी कई बाते है जो मैं भूलना चाहता हु। समय कभी भी एक जैसा नही रहता है। मेरा समय भी शायद बदलना शुरू हो गया। मैं अप्रैल से २००९ से नवभारत पुणे मैं एडिटोरिअल चीफ के तोरे पर कम कर रहा हूमुझे लगता है की वक्त भले ही बदल गए पर हालत नही बदलते है। यहाँ भी कमोबेश वही हालत है या ये कहे की वहासे भी ख़राब है।
Wednesday, January 28, 2009
कई दिनों के बाद....
Tuesday, November 11, 2008
ऐसे भी लोग होते है
मैं अपने इस पोस्ट मै कुछ ऐसे लोगो के बारे मैं लिखना चाहता हु जो दुनिया मैं बेहद अजीब किस्म के होते है। क्या आप मुझे पड़ते हो और उस इंसान के बारे मै पड़ना चाहते हो जो दुनिया मैं जहा जाएगा वहा दुसरो को परेशान करेगा।
Wednesday, September 17, 2008
जिससे बचता रहा आज तक, वही अब रोज कर रहा हु
मुझे लिखने का शौक कभी भी नहीं था। बचपन से लेकर स्कूल औऱ कॉलेज लाइफ में हमेशा ही मैं लिखने से बेहद बचता रहा। लेकिन कहते है न कि आप जो सोचते है या जिससे बचने की कोशिश करते है वो कही न कही आपके सामने जरूर आता है। इसलिए मैं एक पत्रकार बना। और आज जिस चीज़ से हमेशा बचता था वही चीज़ आज मुझे सबसे ज्यादा सुकून देती है।
Monday, September 1, 2008
ऐसा मंजर जिसकी कल्पना भी नही की थी

जम्मू मे अमरनाथ भूमि का मसला भले ही अब हिन्दुओ के पक्ष मे हो गया हो लेकिन उसके बाद भी वहा के हालात कब तक ठीक होगे ये तो वक्त हे बताएगा। मैं दो महीने पहले अपनी फॅमिली के साथ वहा गया था। जब हम जम्मू पहुचे तो उस ही वक्त अमरनाथ श्राइन बोर्ड का मामला टूल पकड़ना शरू हो गया था। वैसे मैं अपनी फॅमिली के साथ वहा नही जाना चाहता था, इसके लिए मैंने कई प्लानिंग भी की। लेकिन घरवालो के दबाव के चलते मुझे वह जाना पडा हालांकि मैं अपनी शर्त पर गया था की मैं चार दिन में वापस आ जाउगा। लेकिन ऐसा हो नही पाया।
.......... रास्ते मै ऐसे बिगडे हालात
जम्मू से श्रीनगर पहुचने तक तो सब ठीक था। हमने जम्मू से एक कार रेंट पर ले ली थी। आगे के सफर में क्या होने वाला था ये कभी सोचा भी नही था। और न ही इस बात की कभी कल्पना के थी के हमारे साथ भी ऐसा हो सकता है। अगले दिन हम सुबह ३ बजे ही श्रीनगर से गुलमर्ग की और रवाना हो गए। हम यहाँ गुलमर्ग में एन्जॉय कर रहे थे और वहा श्रीनगर में हालत बेहद ख़राब हो रहे थे। ज़मीन के मामले में लोग मारपीट और सडको पर उतर आए थे। गुलमर्ग से हम दोपहर दो बजे ही फ्री हो गए थे। ड्राईवर के पास पहुचे तो पता चला के श्रीनगर में फ़िर टेंशन शुरू हो गया था। उसका कहना था की शाम तक नही जा सकते है इसलिये गुलमर्ग में ही रुकना पड़ेगा। हमारे ड्राईवर का नाम हैप्पी था और जैसा नाम था वो ख़ुद भी वैसा ही था। शाम तक हम गुलमर्ग के पास ही रुके रहे। इस दौरान हैप्पी ने हमारा टाइम वहा के किस्से सुनकर पास किया। वहा पर फसने वाले हम अकेले नही थे करीब पाच हज़ार से ज्यादा टूरिस्ट भी हालत सामान्य होने का इंतजार हमारे जैसे ही कर रहे थे। ख़ैर शाम भी हो गई और सबके साथ हम भी गुलमर्ग से निकल ही रहे थे के तीन किलोमीटर आगे सभी की गाड़ी वहा की लोकल पुलिस ने ये कहकर रोक दी की आगे टेंशन है। दो घंटे सभी को फ़िर वही रुकना पड़ा। पाँच हज़ार से ज्यादा टूरिस्ट वह जमा थे और केवल सात पुलिसवाले। कुछ देर बाद वहा के लोकल लड़को ने नारेबाजी शुरू कर दी। वो सभी हिंदू विरोधी नारे लगा रहे थे। पुलिसवालों को यह लगना शुरू हो गया था की यहाँ पर यदि टूरिस्ट रुके और इनपर किसी तरह का कोई हमला होता है तो जवाबदारी उन पर होगी। लोगो को वहा से हटाने के उन्होंने तीन से ज्यादा नाकाम कोशिश करने के बाद आख़िर उन्होंने सेना को मदद के लिए कॉल किया।
ऐसा जवाब जिसे सुनकर यकीन ही नही हुआ
सेना के किसी ऑफिसर से हो रही बात को मैं भी सुन रहा था। वायरलेस पर जो जवाब वह से आया उसे सुनकर एक पल के लिए मुझे यकीन ही नही हुआ। वहा से ये कहा गया की जब तक उन्हें उपर से आर्डर नही मिलेगे वो कुछ नही कर सकते। मुझे सेना के उस ऑफिसर की बात सुनकर एक बार तो तकिन हे नही हुआ। वो कैसे पाच हज़ार टूरिस्ट को इस कन्डीशन मै छोड़ सकते है।
फ़िर क्या था बातचीत के दस मिनट के बाद ही पुलिस वालो ने टूरिस्ट को वह से आगे जाने को कह दिया । वो ये बात अच्छे से जानते थे की उनके रहते हुए यदि एक भी टूरिस्ट को कुछ भी हुआ तो उनपर ही इसकी जवाबदारी आएगी। अपनी जान बचाने के लिए उन्होने टूरिस्ट की जान खतरे मै डालने मै जरा भी देर नही की।
.... और शुरू हुआ वो डरावना सफर
लगभग ढाई सो गाडियो का काफिला एक साथ वहा से निकला। इतने लोग साथ मै थे इस बात की राहत तो जरूर थी लेकिन आगे क्या होगा इसकी चिंता हर किसी के चेहरे पर भी साफ़ नज़र आ रही थी। अभी हम वह से दो किलोमीटर ही आगे चले थे की अचानक हम से आगे चल रही गाड़ीयो की स्पीड तेज़ होती हुई नज़र आई। हम कुछ समझ पाते इससे पहले वह के लोगो की तरफ़ से टूरिस्ट की कार पर फेके जा रहे पत्थर हमारी कार पर पड़ना भी शुरू हो गए थे। अचानक गाड़ी पर पढ़ने वाली पत्थरों से हम सभी बेहद डर गए थे। हमारे गाड़ी की स्पीड भी अब तेज हो गई थी। इसके साथ ही तेज हो गई थी पत्थरों की बरसात। उस वक्त क्या हो रहा था किसी को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। बस हैप्पी की आवाज आई सब अपने साइड के ग्लास चढ़ाकर सिर नीचे कर लो। अगले कुछ सेंकड में एक पत्थर हैप्पी के सिर पर आकर लगा। उसकी साइड का ग्लास थोड़ा खुला हुआ था जिसकी वजह से पत्थर उसे लगा। हालांकि उसे ज्यादा चोट नहीं लगी पर उस हादसे ने आगे के सफर को लेकर चिंता और ज्यादा बढ़ा दी थी। कुछ ही मिनटों में हमारी गाड़ी वहां से गुजर गई। सभी बेहद डरे हुए थे और सभी बस वहां से किसी तरह गुजर जाना चाहते थे। इसके साथ ही तेज हो गई थी पत्थरों की बरसात। उस वक्त क्या हो रहा था किसी को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। बस हैप्पी की आवाज आई सब अपने साइड के ग्लास चढ़ाकर सिर नीचे कर लो। अगले कुछ सेंकड में एक पत्थर हैप्पी के सिर पर आकर लगा। उसकी साइड का ग्लास थोड़ा खुला हुआ था जिसकी वजह से पत्थर उसे लगा। हालांकि उसे ज्यादा चोट नहीं लगी पर उस हादसे ने आगे के सफर को लेकर चिंता और ज्यादा बढ़ा दी थी। कुछ ही मिनटों में हमारी गाड़ी वहां से गुजर गई। सभी बेहद डरे हुए थे और सभी बस वहां से किसी तरह गुजर जाना चाहते थे। इसके साथ ही तेज हो गई थी पत्थरों की बरसात। उस वक्त क्या हो रहा था किसी को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। बस हैप्पी की आवाज आई सब अपने साइड के ग्लास चढ़ाकर सिर नीचे कर लो। अगले कुछ सेंकड में एक पत्थर हैप्पी के सिर पर आकर लगा। उसकी साइड का ग्लास थोड़ा खुला हुआ था जिसकी वजह से पत्थर उसे लगा। हालांकि उसे ज्यादा चोट नहीं लगी पर उस हादसे ने आगे के सफर को लेकर चिंता और ज्यादा बढ़ा दी थी। कुछ ही मिनटों में हमारी गाड़ी वहां से गुजर गई। सभी बेहद डरे हुए थे और सभी बस वहां से किसी तरह गुजर जाना चाहते थे। इसके साथ ही तेज हो गई थी पत्थरों की बरसात। उस वक्त क्या हो रहा था किसी को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। बस हैप्पी की आवाज आई सब अपने साइड के ग्लास चढ़ाकर सिर नीचे कर लो। अगले कुछ सेंकड में एक पत्थर हैप्पी के सिर पर आकर लगा। उसकी साइड का ग्लास थोड़ा खुला हुआ था जिसकी वजह से पत्थर उसे लगा। हालांकि उसे ज्यादा चोट नहीं लगी पर उस हादसे ने आगे के सफर को लेकर चिंता और ज्यादा बढ़ा दी थी। कुछ ही मिनटों में हमारी गाड़ी वहां से गुजर गई। सभी बेहद डरे हुए थे और सभी बस वहां से किसी तरह गुजर जाना चाहते थे।
और बिगड़ गई हैप्पी की तबीयत
पत्थर अब रास्ते में पढ़ने वाले हर गांव में पढ़ना शुरू हो गए थे। कार में जिसके पास जो कपड़ा था हैप्पी के कहने पर सभी ने अपना सिर उससे ढ़क लिया था। डर क्या होता है ये मुझे भी उस दिन महसूस हुआ। मैं कभी डरता नहीं हूं लेकिन उस दिन मैं डर रहा था। मुझे खुद से ज्यादा मेरी फैमिली की चिंता हो रही थी। बस मन में एक ही दुआ ऊपर वाले से मांग रहा था कि किसी तरह हम वापस श्रीनगर सेफ पहुंच जाए। लेकिन शायद उस वक्त ऊपर वाला भी हमारी नहीं सुन सकता था। सफर चल ही रहा था कि आगे जाकर गाड़ी फिर रूकी। पता नहीं था कि अब क्या होगा। हैप्पी बाहर निकला और कुछ देर बाद ही उसे उल्टी होने लगी। उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। वो भी ज्यादा बड़ा नहीं था उसकी उम्र महज २४ साल ही थी। गाड़ी वहां क्यों रूकी है किसी को कुछ नहीं पता था। हम सब चुपचाप कार में बैठे हुए बस यहीं प्राथॆना कर रहें थे कि आगे सबकुछ ठीक हो। यहां हैप्पी की तबीयत ठीक नहीं थी लेकिन वो भी जानता था कि जिस हालात में हम वहां फंसे थे यदि उससे जल्दी नहीं निकले तो पता नहीं और क्या हो जाएगा।
Sunday, August 31, 2008
कभी किसी से उम्मीद मत करो
मै लाइफ में एक चीज़ हमेशा करता हूऔर वो है के किसी से भी कोई उम्मीद नही रखता हू। मुझे लगता है की यही वो फंडाहै जो आपको लाइफ में हमेशा खुश रखता है। कभी यदि ध्यान दे तो हर दुखी इन्सान की कहानी में उम्मीद ही वजह रहती है। कोई दूसरो का ख़ुद के प्रति अच्छे व्यवहार न होने से दुखी है तो कोई इसलिये दुखी है की वो जितना काम करता है उसकी कंपनी उसका उतना ध्यान नही रखती है। यारो ये उम्मीद हमें हर तरफ़ पकड़ने की कोशिश करती है कभी दोस्तों के लिए जो किया उसके बदले के रूप में तो कभी घर के सदस्यों से बिना कोई वजह हमारे लिए कुछ करने के विचार में। ऑफिस में काम करने वाले दोस्तों के हमारे प्रति अच्छी सोच रखने के ख्याल में भी ये उम्मीद ही पीछा नही छोड़ती इसे जितना अपनी ज़िन्दगी से दूर रखोगे उतना ही खुश रहोगे।
Sunday, August 24, 2008
अजीब दास्ता नाम इसलिये रखा है....
मैंने अपने इस ब्लॉग का नाम अजीब दास्ता है इसलिये रखा है क्योंकि मुझे लगता है कि ज़िन्दगी कई बार हमारे सामने अजीबदास्ता पेश करती है। मेरा नाम अमित देशमुख है। भोपाल का रहने वाला हू और एक जर्नलिस्ट हू। मैंने बारहवी के बाद से ही सोच कर रखा था कि मुझे एक जर्नलिस्ट बनना है इसलिये आज बतोर जर्नलिस्ट पिछले तीन साल से काम कर रहा हू। और फिलहाल राजस्थान के एक बड़े ग्रुप के अख़बार में रिपोर्टिंग हेड हू। पिछले तीन सालो में जो अनुभव मुझे हुए है उसको देख कर लगता है की ज़िन्दगी का एक बहुत बड़े पड़ाव से गुज़र चुका हू। अब ऐसा लगता है की शायद ही कोई ऐसा अनुभव हो जो मेरे लिए चौकाने वाला हो। आज जिस उम्र का मैं हू उसमे ज़िन्दगी को जितना समझा है हर बार मुझे हर पहलु वो अजीब दास्तां ही पेश करती नज़र आई है। फ़िर बात चाहे दोस्ती की हो या फ़िर घर की या फ़िर बात करू पत्रकारिता में मिलने वाले कुछ लोगो की जिन्होंने इस बात को और ज्यादा पुख्ता ही किया है। हो सकता है ये मेरा पर्सनल एक्स्पीरिएंस हो या महज मेरे विचार लकिन कुछ तो है।
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